अब तक का सबसे महंगा और सबसे पावरफुल अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट निसार आज यानी, बुधवार 30 जुलाई को लॉन्च होगा। इसे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से शाम 5:40 बजे GSLV-F16 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया जाएगा। ये रॉकेट निसार को 743 किलोमीटर की ऊंचाई पर सूरज के साथ तालमेल वाली सन-सिंक्रोनस कक्षा में स्थापित करेगा, जिसका झुकाव 98.4 डिग्री होगा। इसमें करीब 18 मिनट लगेंगे। इस सैटेलाइट को NASA और ISRO दोनों ने मिलकर बनाया है। निसार 747 किलोमीटर की ऊंचाई पर पोलर ऑर्बिट में चक्कर लगाएगा। पोलर ऑर्बिट एक ऐसी कक्षा है जिसमें सैटेलाइट धरती के ध्रुवों (उत्तर और दक्षिण) के ऊपर से गुजरता है। इस मिशन की अवधि 5 साल है। सवाल-जवाब में मिशन की पूरी डिटेल्स… सवाल 1: निसार सैटेलाइट क्या है? जवाब: निसार एक हाई-टेक सैटेलाइट है। इसका पूरा नाम NASA-ISRO सिंथेटिक एपर्चर रडार है। इसे अमेरिका की स्पेस एजेंसी NASA और भारतीय एजेंसी ISRO ने मिलकर बनाया है। इस मिशन पर 1.2 बिलियन डॉलर यानी करीब 12,500 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। सवाल 2: निसार मिशन के मुख्य उद्देश्य क्या हैं? जवाब: निसार मिशन का मुख्य मकसद है धरती और उसके पर्यावरण को करीब से समझना। ये सैटेलाइट खास तौर पर तीन चीजों पर नजर रखेगा: इन जानकारियों से वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरण को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। मिशन का ओपन-सोर्स डेटा दुनिया भर के शोधकर्ताओं और सरकारों के लिए मुफ्त उपलब्ध होगा। सवाल 3: ये पारंपरिक सैटेलाइट्स से कैसे अलग है? जवाब: पृथ्वी के तेजी से हो रहे बदलाव को पारंपरिक सैटेलाइट्स से बिल्कुल सटीक तरीके से ट्रैक नहीं किया जा सकता। निसार इस कमी को पूरा करता है। ये हर मौसम में हाई-क्वालिटी तस्वीरें लेता है। ये धरती की हर छोटी-बड़ी हरकत को लगभग रियल-टाइम में दिखाएगा। सवाल 4: निसार सैटेलाइट कैसे काम करता है? जवाब: निसार में एक 12 मीटर डायमीटर का गोल्ड प्लेटेड रडार एंटीना है, जो 9 मीटर लंबी बूम से जुड़ा है। ये एंटीना माइक्रोवेव सिग्नल्स को धरती पर भेजता है, जो वापस लौटकर जानकारी देती है। खास बात ये है कि इसे सूरज की रोशनी की जरूरत नहीं, यानी दिन हो या रात, ये हर हाल में काम करता है। ये पहला सैटेलाइट है जो दो तरह के रडार-NASA के L-बैंड और ISRO के S-बैंड का इस्तेमाल करेगा: ये धरती के सेंटीमीटर स्तर के बदलाव को भी पकड़ सकता है। उदाहरण के लिए, अगर धरती कहीं 10 सेंटीमीटर नीचे दब रही है या 15 सेंटीमीटर ऊपर उठ रही है, तो निसार इसे रंगों के जरिए दिखाएगा। जैसे: सवाल 5: इस मिशन को कितने चरणों में बांटा गया है? जवाब: इस मिशन को चार मुख्य चरणों में बांटा गया है: 1. लॉन्च चरण: सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजना निसार को 30 जुलाई 2025 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया जाएगा। ये जगह भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर है। लॉन्च के लिए ISRO का GSLV-F16 रॉकेट इस्तेमाल होगा। 2. डिप्लॉयमेंट चरण: सैटेलाइट को तैयार करना निसार में एक 12 मीटर चौड़ा रडार एंटीना है, जो सैटेलाइट से 9 मीटर दूर एक खास बूम (एक तरह का लंबा ढांचा) पर लगाया गया है। ये बूम NASA के जेट प्रोपल्शन लैब (JPL) ने डिजाइन किया है और ये कई स्टेप्स में अंतरिक्ष में खुलता है। सोचिए, जैसे कोई बड़ा छाता अंतरिक्ष में धीरे-धीरे खुलता है। इस चरण में सैटेलाइट का ये एंटीना पूरी तरह सेट हो जाएगा, ताकि वो काम शुरू कर सके। 3. कमीशनिंग चरण: सिस्टम की जांच लॉन्च के बाद पहले 90 दिन कमीशनिंग या इन-ऑर्बिट चेकआउट (IOC) के लिए होंगे। इस दौरान सैटेलाइट के सारे सिस्टम्स को चेक किया जाएगा, ताकि ये सुनिश्चित हो कि सब कुछ ठीक काम कर रहा है। पहले सैटेलाइट के मुख्य हिस्सों की जांच होगी, फिर JPL के इंजीनियरिंग पेलोड और इंस्ट्रूमेंट्स टेस्ट होंगे। 4. साइंस ऑपरेशन चरण: असली काम की शुरुआत कमीशनिंग के बाद साइंस ऑपरेशन चरण शुरू होगा, जो मिशन के अंत तक चलेगा। इस दौरान निसार धरती की निगरानी शुरू करेगा। सैटेलाइट को सही ऑर्बिट में रखने के लिए समय-समय पर छोटे-छोटे मैन्यूवर्स (पोजीशन बदलने की प्रक्रिया) किए जाएंगे, ताकि वो डेटा इकट्ठा करने में कोई रुकावट न आए। आसान शब्दों में, ये वो स्टेज है जब निसार असली काम शुरू करेगा। यानी धरती की तस्वीरें खींचना, बर्फ, जंगल, समुद्र, और जमीन के बदलावों को ट्रैक करना।
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